मुक़द्दस माह रमज़ान का आगाज़

मुक़द्दस माह रमज़ान का आगाज़

बरेली। इस्लाम धर्म में विशेष स्थान रखने वाले मुक़द्दस माह रमज़ान का आगाज़ हो चुका है। यह महीना बरकतों, रहमतों और मग़फिरत का है, जिसमें मुसलमान अल्लाह की इबादत में मशगूल रहते हैं। शनिवार को चांद दिखने के ऐलान के साथ ही देशभर में रमज़ान की रौनक शुरू हो गई। आज पहला रोज़ा रखा गया और इसी के साथ मस्जिदों और दरगाहों में विशेष नमाज़-ए-तरावीह की शुरुआत भी हो गई।

रमज़ान के चांद की तस्दीक़ होते ही मुस्लिम समाज में खुशी की लहर दौड़ गई। लोग एक-दूसरे को मुबारकबाद देने लगे और मस्जिदों में इबादत का सिलसिला शुरू हो गया। रमज़ान के पूरे महीने में मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं, कुरआन की तिलावत करते हैं और नेकियों की तरफ़ बढ़ते हैं। इस महीने की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें एक रात (शबे-क़द्र) ऐसी होती है जो हज़ार महीनों से भी बेहतर मानी जाती है।

दरगाह आला हज़रत के सज्जादानशीन हज़रत मौलाना सुब्हान रज़ा खान (सुब्हानी मियां) और मुफ्ती अहसन रज़ा क़ादरी (अहसन मियां) ने मुल्कवासियों को रमज़ान की दिली मुबारकबाद दी। साथ ही मुफ्ती सलीम नूरी बरेलवी ने भी रमज़ान की फज़ीलत बयान करते हुए मुसलमानों को इस मुक़द्दस महीने का सही तरीके से एहतराम करने की नसीहत दी।"रमज़ान बरकतों और रहमतों का महीना है। सहरी खाना सुन्नत है, इसलिए इसका खास तौर पर एहतिमाम किया जाए। लेकिन मस्जिदों से सहरी के लिए बार-बार माइक से ऐलान न किया जाए, ताकि उन लोगों की नींद में खलल न पड़े जो किसी वजह से रोज़ा नहीं रख पा रहे हैं या फिर जो दूसरे मजहब से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कहा अल्लाह के रसूल ने फरमाया कि जो शख्स बिना किसी बीमारी या मजबूरी के रमज़ान का रोज़ा छोड़ देगा, फिर वह सारी उम्र भी रोज़ा रखे, तो भी उस एक रोज़े का सवाब हासिल नहीं कर सकता। इसलिए सभी मुसलमान पूरे महीने पूरी शिद्दत से रोज़े रखें और अल्लाह की इबादत करें।"इसके अलावा मुफ्ती अहसन मियां ने इस महीने की रूहानी फज़ीलत पर रोशनी डालते हुए कहा कि रमज़ान में जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। इसका मतलब यह है कि इस महीने में नेकियों की तौफीक ज्यादा होती है और बुराइयों से बचने के लिए अल्लाह की मदद मिलती है।मुफ्ती सलीम नूरी बरेलवी ने रमज़ान की अहमियत पर तफ़सील से चर्चा की।

उन्होंने हदीस शरीफ का हवाला देते हुए कहा कि हमारे नबी-ए-पाक ने शाबान के आखिरी दिनों में फरमाया"ऐ लोगो! तुम्हारे पास अज़मत और बरकत वाला महीना आया है। यह वही महीना है, जिसमें एक रात (शबे-क़द्र) हज़ार महीनों से बेहतर है। इस महीने के रोज़े अल्लाह ने तुम्हारे ऊपर फ़र्ज़ किए हैं। उन्होंने मुसलमानों से गुजारिश की कि वे फर्ज़ नमाज़ों को उनके वक़्त पर अदा करें, कुरआन की तिलावत करें और हर वह काम करें जिससे अल्लाह की रज़ा हासिल हो। साथ ही, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि रोज़ा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी हर बुरी आदत और बुरे काम से बचने का एक बेहतरीन मौका भी है।रमज़ान के चांद के एलान के लिए टीटीएस (तंजीम ताहफ़्फुज़े सुन्नियत) की ओर से दरगाह पर खास इंतजाम किए गए थे। चांद देखने के बाद पूरी मुस्लिम बिरादरी में खुशी की लहर दौड़ गई। इस मौके पर दरगाह से जुड़े प्रमुख लोग मौजूद रहे, जिनमें शाहिद नूरी, परवेज़ नूरी, अजमल नूरी, औरंगज़ेब नूरी, ताहिर अल्वी, हाजी जावेद खान, मंज़ूर रज़ा, शान रज़ा, अबरार उल हक़, अब्दुल माजिद, आलेनबी, जोहिब रज़ा, साजिद रज़ा, इशरत नूरी, सय्यद माजिद, अरबाज रज़ा, आरिफ नूरी, साकिब रज़ा, शाद रज़ा, तारिक सईद, मुजाहिद बेग, काशिफ सुब्हानी, अशमीर रज़ा आदि शामिल थे।

टीटीएस से जुड़े नासिर कुरैशी ने बताया कि इस बार रमज़ान के पहले रोज़े की अवधि 13 घंटे 04 मिनट की होगी, जबकि आखिरी रोज़े की अवधि 13 घंटे 52 मिनट होगी। यानी आखिरी रोज़ा पहले रोज़े की तुलना में 48 मिनट लंबा होगा। रमज़ान केवल भूख और प्यास सहने का महीना नहीं है, बल्कि यह तक़वा (अल्लाह का डर) हासिल करने का एक जरिया है। कुरआन शरीफ में अल्लाह फरमाता है:"ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए, जिस तरह तुमसे पहले लोगों पर किए गए थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ। (सूरह अल-बक़रा 2:183) इस आयत से साफ जाहिर होता है कि रोज़ों का असली मकसद इंसान को अल्लाह से करीब करना और उसमें तक़वा पैदा करना है।