शाही सड़क हादसा: 18 वर्षीय राहुल की मौत
बरेली के शाही में सड़क हादसे में घायल 18 वर्षीय राहुल की मौत, पुलिस पर लापरवाही के आरोप, गांव में शोक और आक्रोश।
अज्ञात वाहन की टक्कर से युवक की मौत
पुलिस पर लापरवाही के गंभीर आरोप
इलाज के दौरान राहुल ने तोड़ा दम
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
दीनानाथ कश्यप । जन माध्यम
शाही। बरेली। सड़क पर बिखरा खून, खाई में पड़ा एक घायल युवक और आसपास खड़े बेबस लोग यह मंजर सिर्फ हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता की कहानी बयां कर रहा है।
शाही–फतेहगंज पच्छिमी मार्ग पर शुक्रवार शाम हुए दर्दनाक सड़क हादसे में घायल 18 वर्षीय राहुल की इलाज के दौरान मौत हो गई। इस घटना ने जहां एक परिवार को उजाड़ दिया, वहीं पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मृतक राहुल, पुत्र मंगली राम, गांव कुलछा का रहने वाला था। बताया जा रहा है कि वह शुक्रवार शाम शाही से अपने घर लौट रहा था। जैसे ही वह लमन गांव के पास पहुंचा, तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने उसे जोरदार टक्कर मार दी और मौके से फरार हो गया। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि राहुल सड़क किनारे खाई में जा गिरा और गंभीर रूप से घायल हो गया।
हादसे के बाद राहगीरों और ग्रामीणों ने मानवता दिखाते हुए उसे खाई से बाहर निकाला और एम्बुलेंस के जरिए बरेली के अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, लेकिन गंभीर चोटों के चलते देर रात राहुल ने दम तोड़ दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पुलिस मौके पर तो पहुंची, लेकिन घायल को तुरंत अस्पताल पहुंचाने के बजाय फोटो खींचने में अधिक व्यस्त रही। इस कथित लापरवाही को लेकर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि अगर समय पर मदद मिलती, तो शायद राहुल की जान बच सकती थी।
घटना के बाद पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और अज्ञात वाहन की तलाश शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि आरोपी को जल्द पकड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
राहुल तीन भाइयों में सबसे छोटा था और उसकी दो बहनें भी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी। पिता मंगली राम भट्टे पर पेशगी लेकर कच्ची ईंटें बनाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। बेटे की असमय मौत ने परिवार को पूरी तरह तोड़ दिया है।
शनिवार को पोस्टमार्टम के बाद गांव में राहुल का अंतिम संस्कार कर दिया गया। पूरे गांव में मातम पसरा है और हर आंख नम है।
अब सवाल यही है क्या सड़क हादसों में मरते लोग सिर्फ आंकड़ा बनकर रह जाएंगे? और क्या जिम्मेदारों की लापरवाही पर कभी ठोस जवाबदेही तय होगी?