ममता ने जीत ली मौत

बरेली के साई सुखदा हॉस्पिटल में 62 वर्षीय माँ ने बेटे को किडनी दान कर नई जिंदगी दी, आयुष्मान योजना में निजी अस्पताल का पहला सफल ट्रांसप्लांट।

ममता ने जीत ली मौत
HIGHLIGHTS:

➡️ 62 साल की माँ ने बेटे को दान की किडनी
➡️ क्रॉनिक किडनी फेलियर से जूझ रहा था युवक
➡️ साई सुखदा हॉस्पिटल में सफल सर्जरी

जन माध्यम
बरेली।
माँ एक ऐसा शब्द, जिसमें पूरी कायनात समाई होती है। जब संतान की सांसें थमने लगें, तो माँ उम्र, दर्द और डर सब भूल जाती है। कुछ ऐसा ही हृदयस्पर्शी और भावुक दृश्य के साई सुखदा हॉस्पिटल में देखने को मिला, जहां 62 वर्षीय माँ ने अपने 35 वर्षीय बेटे को जीवन की सबसे अनमोल भेंट अपनी किडनी दान कर दी। यह सिर्फ एक सर्जरी नहीं थी, यह ममता, त्याग और विश्वास की जीवंत कहानी थी। उत्तराखंड के नैनीताल निवासी युवक पिछले लंबे समय से क्रॉनिक किडनी फेलियर से जूझ रहा था। दोनों किडनियां जवाब दे चुकी थीं और जीवन डायलिसिस मशीनों के सहारे चल रहा था। हर कुछ दिनों में बरेली आना, घंटों अस्पताल में बिताना और फिर घर लौटना यह उसकी दिनचर्या बन चुकी थी। लेकिन बीमारी बढ़ती गई और एक दिन डॉक्टरों ने साफ कह दिया अब किडनी प्रत्यारोपण ही एकमात्र रास्ता है। यह सुनते ही माँ ने एक पल भी नहीं सोचा। न उम्र की परवाह, न अपने शरीर की चिंता बस एक ही बात थी, मेरा बेटा जिंदा रहना चाहिए। बेटे को नई जिंदगी देने का फैसला उसी क्षण हो गया। एक माँ का यह निर्णय, शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।
कानूनी औपचारिकताएं, मेडिकल जांचें और सख्त प्रोटोकॉल हर पड़ाव पर माँ की आंखों में सिर्फ उम्मीद थी। कई घंटों तक चली इस जटिल सर्जरी ने जब सफलता का रूप लिया, तो ऑपरेशन थिएटर के बाहर खड़े परिजनों की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। सर्जरी के तुरंत बाद नई किडनी ने काम करना शुरू कर दिया यह पल किसी चमत्कार से कम नहीं था।
इस ऐतिहासिक किडनी ट्रांसप्लांट का नेतृत्व वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट और किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. शरद अग्रवाल ने किया। उनके साथ डॉ. सीता राम सिंह कुलराज, डॉ. ऋषि अग्रवाल, डॉ. ध्रुव मोहन, डॉ. प्रजाय श्रीवास्तव, डॉ. आशु हिरानी, डॉ. रोहित सिंघल सहित विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुभवी टीम मौजूद रही। पोस्ट-ऑपरेटिव केयर और इमरजेंसी टीम की निगरानी रखकर इस सफलता को मजबूती दी।
यह उपलब्धि इसलिए भी ऐतिहासिक है, क्योंकि आयुष्मान भारत योजना के तहत बरेली के किसी निजी अस्पताल में पहली बार किडनी प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किया गया। साई सुखदा हॉस्पिटल ने यह साबित कर दिया कि उन्नत चिकित्सा सुविधाएं अब बड़े महानगरों तक सीमित नहीं हैं। डॉक्टरों का कहना है कि क्रॉनिक किडनी फेलियर का स्थायी इलाज किडनी ट्रांसप्लांट ही है। माँ बेटे की यह कहानी अंगदान के महत्व को भावनात्मक रूप से रेखांकित करती है एक अंगदान, एक नहीं, कई जिंदगियों को रोशनी दे सकता है। हॉस्पिटल प्रबंधन ने इसे बरेली मंडल के लिए मील का पत्थर बताया। अब गंभीर किडनी रोगियों को दिल्ली या लखनऊ की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए आयुष्मान योजना के तहत यह सुविधा किसी वरदान से कम नहीं।
यह कहानी सिर्फ चिकित्सा सफलता की नहीं है, यह माँ के असीम प्रेम की कहानी है जिसने एक बार फिर साबित कर दिया कि माँ सच में भगवान का दूसरा रूप होती है। बरेली के चिकित्सा इतिहास में यह दिन हमेशा सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।