महिला जिला अस्पताल में चपरासी बना बाबू, एसी कमरे से चला रहा हुक्म
महिला जिला अस्पताल में तैनात मल्टीटास्क चपरासी अशोक कुमार द्वारा एसी कमरे में बैठकर बाबू का कार्य करने और हुक्म चलाने पर कर्मचारियों में आक्रोश।
महिला जिला अस्पताल में तैनात मल्टीटास्क चपरासी के ऊंचे रसूख का मामला आया सामने।
चपरासी को कथित रूप से अस्पताल अधीक्षक का संरक्षण प्राप्त होने की क्षेत्र में है भारी चर्चा।
अपने मूल पद के दायित्वों को छोड़ वातानुकूलित (एसी) कमरे में बैठकर लिपिक (बाबू) का संभाल रहा काम।
अस्पताल के नियमित कर्मचारियों में व्यवस्था को लेकर उपजा गहरा असंतोष, जांच की उठी मांग.
हसीन दानिश/ जन माध्य
मबरेली। जनपद के जिला महिला चिकित्सालय प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करने वाला एक बेहद अचरज भरा मामला प्रकाश में आया है। अस्पताल परिसर में चारों तरफ इस बात की चर्चा आम है कि यहाँ तैनात एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यानी मल्टीटास्क चपरासी नियमों को ताक पर रखकर बाबू (लिपिक) की कुर्सी पर काबिज हो गया है। वह न सिर्फ बाबू की मुख्य जिम्मेदारियां निभा रहा है, बल्कि आराम से वातानुकूलित (एसी) कमरे में बैठकर अन्य अधीनस्तों पर हुक्म भी चला रहा है।
अस्पताल के अंदरूनी सूत्रों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इस चपरासी का नाम अशोक कुमार है। उनकी नियुक्ति मूल रूप से अस्पताल में एक साधारण चपरासी के तौर पर हुई थी। आरोप है कि वर्तमान अस्पताल अधीक्षक की विशेष कृपा और कथित मिलीभगत या प्रत्यक्ष संरक्षण के चलते इस कर्मचारी का रुतबा अचानक बेहद बढ़ गया है। अब वे एक चपरासी की तय वर्दी और काम से दूर रहकर पूरी तरह से एक प्रशासनिक अधिकारी जैसी जीवनशैली और तेवर अपनाए हुए हैं।
चिकित्सालय के ठंडे कमरे में बैठकर दैनिक कामकाज को खुद देखना, महत्वपूर्ण पत्रावलियों और फाइलों को आगे बढ़ाना तथा अन्य सहकर्मियों को कड़े निर्देश जारी करना अब इनकी दिनचर्या में शामिल हो चुका है। अस्पताल प्रबंधन द्वारा दी गई इस खुली छूट और मनमर्जी ने वहाँ काम करने वाले योग्य और नियमित बाबू वर्ग व अन्य चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के बीच भारी असंतोष और गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। कई सहकर्मी दबी जुबान में यह सवाल उठा रहे हैं कि एक चपरासी को पद की मर्यादा के विरुद्ध जाकर इतनी बड़ी सुविधाएं और अहम प्रशासनिक अधिकार आखिर किस नियम के तहत सौंपे गए हैं।
इस विचित्र प्रशासनिक विसंगति को लेकर अब स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं, आम जनता और पीड़ित अस्पताल कर्मियों ने मोर्चा खोल दिया है। लोगों का कहना है कि इस प्रकार की भाई-भतीजावाद और मनमानी से न सिर्फ सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं, बल्कि संस्थान में दिन-रात ईमानदारी से मेहनत करने वाले योग्य कर्मियों का हक भी मारा जा रहा है। सभी पक्षों ने मामले की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जिले के उच्च स्वास्थ्य अधिकारियों से इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं त्वरित जांच कराने की पुरजोर मांग की है ताकि सच सबके सामने आ सके।